दतिया पण्डोखर गुरु को रक्षासूत्र समर्पण का पवित्र संकल्प

रक्षाबंधन भाई-बहन के स्नेह का पर्व तो है ही, यह रक्षा, विश्वास, कर्तव्य और मर्यादा के पवित्र संकल्प का उत्सव भी है। हम सभी आज के दिन सबसे पहले अपने आराध्य ईष्ट देवी - देवताओं और सद्गुरु को रक्षासूत्र समर्पित करते हैं।
मेरे लिए भी यह सौभाग्य और भाव-विभोर कर देने वाला क्षण है कि परम पूज्य सद्गुरुदेव श्री गुरुशरण जी महाराज (पण्डोखर सरकार) की पावन कलाई पर एक शिष्य के रूप में रक्षासूत्र बाँधने का अवसर प्राप्त हुआ। "ये रक्षा सूत्र नहीं, एक पवित्र विश्वास होता है, जो हर संकट से बचने वाला ईश्वरीय आशीर्वाद होता है।
सामान्यतः गुरु ही शिष्य की रक्षा करते हैं, उसे अज्ञान से ज्ञान की ओर, भ्रम से सत्य की ओर और विपत्ति से सद्मार्ग की ओर ले जाते हैं। फिर प्रश्न उठता है कि शिष्य गुरु को रक्षासूत्र क्यों बाँधे?
इसका उत्तर रक्षासूत्र की आध्यात्मिक भावना में छिपा है। गुरु को रक्षासूत्र बाँधने का अर्थ स्वयं को गुरु, गुरुवाणी, गुरु-मर्यादा और उनके द्वारा प्रदत्त धर्म एवं सेवा-पथ की रक्षा के लिए समर्पित करने का संकल्प है।
यह पवित्र धागा मानो शिष्य की मौन प्रतिज्ञा होता है—
“गुरुदेव! रक्षा तो सदैव आप ही हमारी करते आए हैं। आज यह रक्षासूत्र आपकी कलाई पर बाँधकर मैं संकल्प करता हूँ कि आपके दिए संस्कारों, सिद्धांतों, मर्यादाओं और सेवा-पथ के प्रति सदैव निष्ठावान रहूँगा। आपके सम्मान को अपना सम्मान और आपके द्वारा दिखाए धर्ममार्ग की सेवा को अपना कर्तव्य मानूँगा।
गुरु और शिष्य का संबंध सांसारिक स्वार्थ से नहीं, बल्कि श्रद्धा, विश्वास, अनुशासन और आत्मिक समर्पण से निर्मित होता है। इसलिए गुरु की कलाई पर बँधा रक्षासूत्र वास्तव में शिष्य की अपनी आत्मा पर बधी वह पवित्र गाँठ है, जो उसे जीवनभर गुरुनिष्ठा और कर्तव्य बोध का स्मरण कराती रहे।
पूज्य गुरुदेव की कृपा और आशीर्वाद सदैव हम सभी पर बना रहे तथा हम उनके बताए धर्म, सेवा और मानव-कल्याण के मार्ग पर चलते रहें, यही इस पावन रक्षाबंधन पर मेरी प्रार्थना है।
गुरु रक्षा करें हमारे जीवन की, हम रक्षा करें माता। - पिता और गुरु की मर्यादा और आदर्शों की।*
रक्षाबंधन की हार्दिक बधाई एवं अनंत शुभकामनाएँ।











