श्रावस्ती - श्रीलंका के 105 सदस्यीय बौद्ध श्रद्धालुओं के दल ने श्रावस्ती में की पूजा-अर्चना
श्रावस्ती में श्रीलंका के 105 बौद्ध श्रद्धालुओं ने की पूजा-अर्चना, भिक्षु सुमेधा महाथेरो ने बताया मध्यम मार्ग का महत्व

श्रावस्ती। बौद्ध तपोस्थली श्रावस्ती में शनिवार को श्रीलंका से पहुंचे 105 सदस्यीय बौद्ध श्रद्धालुओं के दल ने भगवान बुद्ध के पवित्र स्थलों के दर्शन कर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की। बौद्ध भिक्षु सुमेधा महाथेरो के नेतृत्व में आए श्रद्धालुओं ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार गंध कुटी में विशेष पूजा की। इसके बाद बौद्ध सभा का आयोजन किया गया, जिसमें भगवान बुद्ध की शिक्षाओं और बौद्ध दर्शन के महत्व पर चर्चा हुई।
सभा को संबोधित करते हुए भिक्षु सुमेधा महाथेरो ने कहा कि वास्तविक ज्ञान वही है, जो मनुष्य को जीवन में व्याप्त दुखों, उनके कारणों और उनसे मुक्ति पाने के उपायों को समझने में सहायता करे। उन्होंने भगवान बुद्ध के चार आर्य सत्यों की व्याख्या करते हुए बताया कि दुख, दुख का कारण, दुख का निरोध और दुख निरोध तक पहुंचने का मार्ग बौद्ध दर्शन के प्रमुख आधार हैं।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने जीवन में किसी भी प्रकार की अति से बचना चाहिए। न तो अत्यधिक भोग-विलास उचित है और न ही अनावश्यक अभाव। जीवन में संतुलन बनाए रखना ही मध्यम मार्ग का सार है। उन्होंने श्रद्धालुओं को भगवान बुद्ध की शिक्षाओं को अपने जीवन में अपनाने और सदाचार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी।
भिक्षु सुमेधा महाथेरो ने सम्यक् जीवन और नैतिक आचरण के लिए भगवान बुद्ध द्वारा बताए गए अष्टांगिक मार्ग के महत्व पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि इन शिक्षाओं को अपनाकर व्यक्ति अपने जीवन में शांति, संतुलन और सकारात्मकता ला सकता है।
श्रीलंका से आए श्रद्धालुओं की इस यात्रा ने श्रावस्ती की बौद्ध आध्यात्मिक परंपरा और भारत-श्रीलंका के बीच साझा बौद्ध विरासत के महत्व को एक बार फिर रेखांकित किया।









