दतिया /पण्डोखर 24 वर्ष की उम्र में सागर से अयोध्या तक कारसेवा की जोखिमभरी यात्रा: संघर्ष, साहस और बलिदान की अविस्मरणीय गाथा

दतिया/ पण्डोखर 30 अक्टूबर और 2 नवंबर 1990 की कारसेवा को याद कर भावुक हुए पण्डोखर धाम की नींव के पत्थर और विश्व हिंदू परिषद के पूर्व नगर मंत्री मुकेश कुमार गुप्ता; हुतात्मा रामभक्तों को दी श्रद्धांजलि
सागर। श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन भारतीय इतिहास का ऐसा अध्याय है, जिसमें आस्था, संघर्ष, संगठनात्मक अनुशासन और असंख्य रामभक्तों के त्याग एवं बलिदान की अविस्मरणीय गाथा समाहित है। 30 अक्टूबर और 2 नवंबर 1990 को अयोध्या में हुई कारसेवा की स्मृतियाँ आज भी उस आंदोलन से जुड़े लोगों के हृदय में जीवंत हैं। इसी ऐतिहासिक आंदोलन से जुड़े अपने संस्मरण साझा करते हुए सागर निवासी विश्व हिंदू परिषद के पूर्व नगर मंत्री मुकेश कुमार गुप्ता ने अपनी सागर से अयोध्या तक की संघर्षपूर्ण कारसेवा यात्रा को याद किया। श्री गुप्ता बताते हैं कि 25 अक्टूबर 1990 को मात्र 24 वर्ष की आयु में विश्व हिंदू परिषद के नगर मंत्री के दायित्व का निर्वहन करते हुए उन्होंने सैकड़ों कारसेवकों का नेतृत्व कर 30 अक्टूबर की कारसेवा में भाग लेने का संकल्प लिया था। उस समय उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव की घोषणा—'अयोध्या में परिंदा भी पर नहीं मार सकता'—कारसेवकों के सामने एक बड़ी चुनौती थी। लेकिन श्रीराम जन्मभूमि पर कारसेवा का संकल्प लेकर निकले रामभक्त किसी भी चुनौती से विचलित होने को तैयार नहीं थे। सागर से अयोध्या तक जोखिमभरा सफर मुकेश गुप्ता के अनुसार, 25 अक्टूबर को वे रेलगाड़ी से सागर से कटनी होते हुए नैनी, प्रयागराज पहुँचे। वहाँ धारा 144 लागू थी और कारसेवकों को देखते ही गिरफ्तार किया जा रहा था। गिरफ्तारी से बचने के लिए कारसेवक चार-पाँच के छोटे समूहों में बँटकर छिपते-छिपाते आगे बढ़ रहे थे। 26 अक्टूबर की अलसुबह उनके साथ बजरंग दल के नगर संयोजक अरविन्द जैन (गुड्डू), रामसेवक यादव और कमल हुकुमचंद मलैया सहित केवल चार लोग रह गए थे। अधिकांश साथी रास्ते में गिरफ्तार हो चुके थे तथा अनेक कारसेवकों को हिंसा और प्रताड़ना का सामना करना पड़ा था। चारों साथी चुपचाप बस से प्रतापगढ़ पहुँचे। वहाँ भी कर्फ्यू लागू था और कारसेवकों की गिरफ्तारियाँ जारी थीं। भय और दहशत के माहौल में कोई किसी को जानकारी देने तक को तैयार नहीं था। बड़ी कठिनाई से एक कांग्रेसी विचारधारा वाले, किंतु कट्टर रामभक्त हिंदू परिवार का संरक्षण मिला। इसी परिवार के मार्गदर्शन और सहयोग से चारों ने रात के अँधेरे में सुनसान रास्तों से पैदल ही अयोध्या की ओर प्रस्थान किया। गाँव-गाँव मिला रामभक्तों का अभूतपूर्व सहयोग* श्री गुप्ता बताते हैं कि चार दिन-रात तक गाँवों, पगडंडियों और सुनसान रास्तों से छिपते-छिपाते उनकी यात्रा जारी रही। इस कठिन सफर में स्थानीय रामभक्तों का सहयोग अविस्मरणीय रहा। जहाँ भी ग्रामीणों को उनके आने की जानकारी मिलती, वहाँ आत्मीय स्वागत-सत्कार किया जाता। वे भावुक होकर बताते हैं कि छोटे-छोटे गाँवों में ग्रामीण बड़े थाल में जल लेकर खड़े हो जाते, कारसेवकों के चरण धोते और आरती उतारकर उनका अभिनंदन करते थे। कहीं चाय और भोजन की व्यवस्था होती, तो कहीं विश्राम और सुरक्षा का प्रबंध किया जाता। अनजान लोगों का ऐसा आत्मीय समर्पण देखकर कारसेवक भावविभोर हो उठते थे। इन सबके सहयोग और प्रभु श्रीराम की कृपा से अंततः वे निर्धारित कारसेवा के मुहूर्त पर अयोध्या पहुँचने में सफल हुए। 30 अक्टूबर 1990 : अयोध्या में गूँजा जय श्रीराम का उद्घोष 30 अक्टूबर 1990 का दिन आंदोलन के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन के महानायक पूजनीय अशोक जी सिंघल के नेतृत्व में लाखों कारसेवक अचानक जय श्रीराम के गगनभेदी उद्घोष के साथ अयोध्या की गलियों में प्रकट हुए और श्रीराम जन्मभूमि पहुँचकर कारसेवा प्रारंभ की। मुकेश गुप्ता के अनुसार, इस घटनाक्रम से तत्कालीन सरकार बौखला उठी और कारसेवकों पर लाठीचार्ज तथा गोलीबारी की गई। अनेक कारसेवक घायल हुए और कई ने अपने प्राणों का बलिदान दिया। इसी संघर्ष में कोठारी बंधुओं सहित अनेक रामभक्तों ने सर्वोच्च बलिदान दिया। उस समय अयोध्या की गलियों में एक ही उद्घोष गूँजता था सौगंध राम की खाते हैं, हम मंदिर वहीं बनाएंगे, हम मंदिर भव्य बनाएंगे, कारसेवकों में भारी आक्रोश था, लेकिन संगठन के अनुशासन और नेतृत्व के निर्णय के अनुसार आगे की कारसेवा के लिए पुनः योजनाबद्ध प्रयास किया गया। 2 नवंबर 1990 : निहत्थे कारसेवकों पर गोलीबारी का हृदयविदारक घटनाक्रम मुकेश गुप्ता बताते हैं कि 2 नवंबर को अयोध्या के घरों, आश्रमों, जंगलों और आसपास के गाँवों में ठहरे लाखों कारसेवक अलग-अलग रास्तों से संतों के नेतृत्व में पुनः कारसेवा के लिए आगे बढ़े। रामभक्तों का विशाल जनसमूह जय श्रीराम के उद्घोष के साथ आगे बढ़ रहा था। निहत्थे कारसेवकों के इस सैलाब को देखकर तत्कालीन मुलायम सिंह सरकार ने गोलीबारी कराई, जिसमें बड़ी संख्या में कारसेवक घायल हुए और अनेक ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए। वे बताते हैं कि उस समय के अनेक दृश्य आज भी मन को विचलित कर देते हैं। बलिदानी कारसेवकों के शवों को बालू की बोरियों से बाँधकर सरयू नदी में फेंके जाने की पीड़ादायक घटनाओं की स्मृतियाँ आज भी आंदोलन से जुड़े लोगों के मन में अंकित हैं। दूसरी ओर, घायल कारसेवकों को श्रीराम चिकित्सालयों तक पहुँचाने में स्वयं रामभक्त दिन-रात जुटे हुए थे। अयोध्या की पावन धरती और सरयू का जल उस हिंसक घटनाक्रम में कारसेवकों के रक्त से रक्तरंजित हो उठा था। साकार हुआ वर्षों पुराना स्वप्न श्री गुप्ता कहते हैं कि उस समय पूर्ण विश्वास था कि श्रीराम जन्मभूमि पर एक दिन भव्य मंदिर अवश्य बनेगा, लेकिन अपने जीवनकाल में उस स्वप्न को साकार होते देखने का सौभाग्य मिलेगा, इसकी कल्पना नहीं की थी। आज अयोध्या में प्रभु श्रीराम का भव्य और दिव्य मंदिर निर्मित होकर रामभक्तों की आस्था का केंद्र बन चुका है। मंदिर के दर्शन और वर्तमान स्वरूप को देखकर 1990 के संघर्षपूर्ण दिन, सागर से अयोध्या तक की जोखिमभरी यात्रा, सहयोग करने वाले अनजान रामभक्त परिवार और बलिदान देने वाले कारसेवकों की स्मृतियाँ स्वतः जीवंत हो उठती हैं। उन्होंने कहा कि श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर का निर्माण असंख्य रामभक्तों के दशकों के संघर्ष, त्याग, तपस्या और बलिदान का प्रतिफल है। आज हुतात्मा दिवस के अवसर पर उन सभी अमर रामभक्तों के श्रीचरणों में अनंत कोटि नमन करते हुए उनकी स्मृति को श्रद्धापूर्वक नमन करता हूँ।उनका त्याग, उनका साहस और उनकी रामभक्ति आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरणा देती रहेगी। प्रमोद शास्त्री









