पाली परियोजना में रेडी टू ईट के नाम पर लाखों का खेल!
प्रतिमाह 20-22 लाख रुपये के बिल, फिर भी कई आंगनबाड़ियों तक समय पर नहीं पहुंच रहा पोषण आहार

कोरबा/पाली। राज्य सरकार द्वारा छत्तीसगढ़ को कुपोषण मुक्त बनाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन महिला एवं बाल विकास विभाग की पाली परियोजना में रेडी टू ईट पोषण आहार की आपूर्ति व्यवस्था सवालों के घेरे में है। आरोप है कि परियोजना से प्रतिमाह करीब 20 से 22 लाख रुपये का रेडी टू ईट बिल जिला कार्यालय भेजा जा रहा है, जबकि कई आंगनबाड़ी केंद्रों तक निर्धारित समय और मात्रा में पोषण आहार नहीं पहुंच पा रहा है।
बताया जा रहा है कि बीते सप्ताह पाली परियोजना के पोड़ी, सिल्ली, लाफा, माखनपुर, सपलवा सहित कई सेक्टरों के आंगनबाड़ी केंद्रों में रेडी टू ईट की आपूर्ति प्रभावित रही। इससे आंगनबाड़ी केंद्रों में पंजीकृत बच्चों, गर्भवती महिलाओं, शिशुवती माताओं और किशोरी बालिकाओं को निर्धारित पोषण आहार मिलने में परेशानी हुई।
खबर के बाद आनन-फानन में पहुंचाया गया आहार
मामले को लेकर खबर प्रसारित होने के बाद परियोजना कार्यालय में हलचल मची और जिन क्षेत्रों में आपूर्ति नहीं हुई थी, वहां आनन-फानन में रेडी टू ईट पहुंचाने की प्रक्रिया शुरू होने की बात सामने आई। विभागीय सूत्रों के अनुसार पोड़ी, सिल्ली, बकसाही सहित कुछ क्षेत्रों में बाद में रेडी टू ईट की गाड़ियां पहुंचीं। वहीं लाफा, सपलवा, चैतमा और माखनपुर क्षेत्र में भी देरी से आपूर्ति होने की जानकारी सामने आई।
हर माह की पहली तारीख को पहुंचना चाहिए आहार
नियम के अनुसार आंगनबाड़ी केंद्रों में पंजीकृत हितग्राहियों की संख्या के आधार पर निर्धारित मात्रा में पोषण आहार समय पर उपलब्ध कराया जाना चाहिए। लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों से लगातार ऐसी शिकायतें सामने आने पर व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
दर्ज संख्या से कम पैकेट पहुंचने का आरोप
स्थानीय स्तर पर यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि कुछ आंगनबाड़ी केंद्रों में दर्ज हितग्राहियों की संख्या की तुलना में कम पैकेट पहुंचाए जाते हैं। यदि ऐसा है तो इसकी निष्पक्ष जांच जरूरी है, क्योंकि एक-एक पैकेट सीधे किसी बच्चे, गर्भवती महिला या अन्य पात्र हितग्राही के पोषण से जुड़ा है।
दूरस्थ क्षेत्रों में ज्यादा परेशानी
पाली परियोजना के दूरस्थ, पहाड़ी और वनांचल क्षेत्रों में रहने वाले हितग्राहियों को कथित तौर पर सबसे अधिक परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। इन क्षेत्रों में समय पर सामग्री नहीं पहुंचने से आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और हितग्राहियों के सामने समस्या खड़ी हो जाती है।
बिल और वास्तविक आपूर्ति की जांच जरूरी
मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि प्रतिमाह लाखों रुपये का बिल तैयार होकर भुगतान की प्रक्रिया पूरी हो रही है, तो वास्तविक रूप से कितनी मात्रा में रेडी टू ईट का निर्माण, परिवहन और वितरण किया गया? इसका जवाब आपूर्ति रजिस्टर, स्टॉक रजिस्टर, वितरण पंजी, आंगनबाड़ीवार हितग्राही संख्या और भुगतान संबंधी दस्तावेजों की जांच से स्पष्ट हो सकता है।
परियोजना अधिकारी की भूमिका पर भी सवाल
पूरे मामले में परियोजना कार्यालय की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि समय पर आपूर्ति नहीं होने के बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा प्रभावी निगरानी नहीं की गई। हालांकि इन आरोपों की पुष्टि के लिए विभागीय जांच आवश्यक है।
प्रशासन से जांच की मांग
ग्रामीणों और स्थानीय लोगों ने जिला प्रशासन से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। साथ ही प्रत्येक आंगनबाड़ी केंद्र में स्वीकृत मात्रा, वास्तविक आपूर्ति और हितग्राहियों को वितरित मात्रा का मिलान कराने की मांग उठ रही है।
बहरहाल, खबर प्रसारित होने के बाद आपूर्ति शुरू होना व्यवस्था में सुधार का संकेत है या केवल तत्काल दबाव में की गई कार्रवाई—यह जांच के बाद ही स्पष्ट होगा। अब देखना होगा कि जिला प्रशासन मामले को कितनी गंभीरता से लेता है और पोषण आहार की आपूर्ति में यदि कोई अनियमितता पाई जाती है तो जिम्मेदार लोगों पर क्या कार्रवाई होती है।
कोरबा संवाददाता रविशंकर चौहान

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