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20 अक्टूबर 2026 · नई दिल्लीई-पेपरलॉगिन
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39 दिनों की जंग जीतकर घर लौटा अति अपरिपक्व शिशु, एसएनसीयू टीम ने बचाई जिंदगी

39 दिनों की जंग जीतकर घर लौटा अति अपरिपक्व शिशु, एसएनसीयू टीम ने बचाई जिंदगी
39 दिनों की जंग जीतकर घर लौटा अति अपरिपक्व शिशु, एसएनसीयू टीम ने बचाई जिंदगी — अध्यात्म | City News 24

27-28 सप्ताह में जन्मे बेहद कमजोर नवजात ने दी कई गंभीर जटिलताओं को मात, 6 ग्राम हीमोग्लोबिन पर चढ़ाया रक्त, 21 दिन तक रहा सिपेप पर

देवास। जिला चिकित्सालय देवास की एसएनसीयू टीम ने अपनी प्रतिबद्धता और अथक प्रयासों से करीब 27-28 सप्ताह में जन्मे अति अपरिपक्व एवं बेहद कम वजन के शिशु को 39 दिनों के उपचार के बाद स्वस्थ अवस्था में घर भेजकर मिसाल कायम की है। जन्म के बाद शिशु को सांस लेने में परेशानी सहित कई गंभीर जटिलताओं का सामना करना पड़ा, लेकिन चिकित्सकों और नर्सिंग स्टाफ की लगातार निगरानी और उपचार से आखिरकार शिशु ने जिंदगी की जंग जीत ली।

मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. सरोजिनी जेम्स बेक ने बताया कि ग्राम पत्थर गुराडिया, बरोठा निवासी 25 वर्षीय आरती पति राजेंद्र ने 16 जुलाई 2026 की रात करीब 9:10 बजे देवास के एक निजी नर्सिंग होम में सामान्य प्रसव के दौरान शिशु को जन्म दिया। शिशु का जन्म समय से करीब 12-13 सप्ताह पहले हो गया था। जन्म के समय उसका वजन बेहद कम था और उसे तत्काल विशेष नवजात शिशु देखभाल की आवश्यकता थी।

जन्म के करीब एक घंटे बाद शिशु को प्रीमेच्योरिटी, लो बर्थ वेट और सांस लेने में तकलीफ के चलते जिला चिकित्सालय देवास की एसएनसीयू में भर्ती कराया गया। उपचार के दौरान शिशु को हाइलाइन मेम्ब्रेन डिजीज, बार-बार एप्निया, सेप्सिस, शॉक, पीलिया, नेक्रोटाइजिंग एंटरोकोलाइटिस (एनईसी) और एनीमिया ऑफ प्रीमेच्योरिटी जैसी गंभीर जटिलताओं का सामना करना पड़ा।

इतने कम समय में जन्मे बच्चों के फेफड़ों का विकास पूर्ण नहीं होता। शिशु को सांस लेने में सहायता के लिए सिपेप पर रखा गया और फेफड़ों के विकास में मदद के लिए सरफेक्टेंट इंजेक्शन दिया गया। यह इंजेक्शन बाजार में करीब 10 हजार रुपये का होता है, लेकिन शासकीय स्वास्थ्य संस्थानों में नवजातों के उपचार के लिए इसे नि:शुल्क उपलब्ध कराया जाता है।

उपचार के दौरान शिशु को कई बार एप्निया हुआ और सीपीआर देकर उसकी जान बचाई गई। गंभीर संक्रमण के कारण उसकी आंतों से रक्तस्राव होने लगा और प्लेटलेट्स की संख्या घटकर करीब 10 हजार तक पहुंच गई। इसके बाद दो बार प्लेटलेट्स ट्रांसफ्यूजन किया गया। पीलिया के उपचार के लिए फोटोथैरेपी भी दी गई।

करीब 13 दिनों बाद स्थिति स्थिर होने पर नली के माध्यम से दूध देना शुरू किया गया और धीरे-धीरे इसकी मात्रा बढ़ाई गई। हालांकि कुछ दिनों बाद शिशु एनईसी की गंभीर समस्या में चला गया और दूध बंद करना पड़ा। इस दौरान नसें मिलना भी मुश्किल हो गया था। परिजनों ने इंदौर रेफर कराने के बजाय देवास में ही उपचार जारी रखने की इच्छा जताई। टीम ने लगातार प्रयास करते हुए उपचार जारी रखा और स्थिति में सुधार आने पर दोबारा नली से दूध एवं दवाएं शुरू की गईं।

लगातार 21 दिन सिपेप पर रहने के बाद शिशु को ऑक्सीजन पर शिफ्ट किया गया। करीब 10 दिन ऑक्सीजन पर रखने के बाद धीरे-धीरे ऑक्सीजन हटाने का प्रयास किया गया। करीब एक माह के अथक प्रयासों के बाद शिशु कटोरी से दूध पीने में सक्षम हुआ। साथ ही मां को भी शिशु को दूध पिलाने का तरीका सिखाया गया।

उपचार के दौरान शिशु में खून की कमी के लक्षण भी सामने आए। जांच के लिए सैंपल लेना बेहद कठिन था। नर्सिंग स्टाफ ने काफी प्रयासों के बाद सैंपल लिया, जिसमें हीमोग्लोबिन महज 6 ग्राम पाया गया। इसके बाद शिशु को पीआरबीसी (पैक्ड रेड ब्लड सेल्स) चढ़ाया गया।

शिशु को उपचार के दौरान एमएनसीयू में भी शिफ्ट किया गया। मां के साथ उसका पहला बच्चा भी बहुत छोटा था और मां से अलग नहीं रह पा रहा था। टीम ने उसकी भी व्यवस्था एमएनसीयू में की, जिससे मां अपने दोनों बच्चों की देखभाल कर सकी।

लगातार 39 दिनों के उपचार के बाद शिशु की हालत में उल्लेखनीय सुधार हुआ और उसे डिस्चार्ज कर दिया गया। डिस्चार्ज के सात दिन बाद हुए फॉलोअप में शिशु स्वस्थ पाया गया। अब शिशु का एक वर्ष तक नियमित फॉलोअप किया जाएगा।

दिन-रात की मेहनत ने बचाई नन्ही जिंदगी

इस सफलता में एसएनसीयू की शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. वैशाली निगम, डॉ. अनुज चाचरे, डॉ. अश्विन सिंह, डॉ. कार्तिक तिवारी सहित संपूर्ण नर्सिंग स्टाफ की महत्वपूर्ण भूमिका रही। टीम ने लगातार निगरानी, उपचार और देखभाल करते हुए शिशु को गंभीर परिस्थितियों से बाहर निकाला।

शिशु की मां आरती और परिजनों ने जिला चिकित्सालय की पूरी टीम का आभार व्यक्त किया। सीएमएचओ डॉ. सरोजिनी जेम्स बेक ने कहा कि जिला चिकित्सालय की एसएनसीयू टीम ने समर्पण और प्रतिबद्धता के साथ अति अपरिपक्व शिशु को जीवन दिलाया। यह सफलता चिकित्सकों और नर्सिंग स्टाफ की टीमवर्क, मेहनत और सतत प्रयासों का परिणाम है।

Ravi kumre
Ravi kumre
रिपोर्टर · City News 24
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